दो अर्थशास्त्रियों ने वे मॉडल नए सिरे से बनाए, जिनका इस्तेमाल केंद्रीय बैंक और सरकारें अर्थव्यवस्था की तेज़ी और मंदी के झटकों को नरम करने के लिए करती हैं।
- 1970 के दशक में पुराने आर्थिक मॉडल नाकाम हो गए, और महंगाई (इन्फ्लेशन) और बेरोज़गारी एक साथ बढ़ीं।
- रॉबर्ट ई. हॉल (Robert E. Hall) ने दिखाया कि परिवारों का खर्च इस पर निर्भर करता है कि वे भविष्य से क्या उम्मीद रखते हैं, और इसे परखने का तरीक़ा भी खोजा।
- माइकल वुडफ़ोर्ड (Michael Woodford) ने इस विचार को पूरी अर्थव्यवस्था के एक सरल मॉडल में पिरोया, जिसका इस्तेमाल आज केंद्रीय बैंक ब्याज दरें तय करने के लिए करते हैं।
पहले क्या समस्या थी
जॉन मेनार्ड कीन्स (John Maynard Keynes) के समय से सरकारें और केंद्रीय बैंक (सेंट्रल बैंक) अर्थव्यवस्था के उतार-चढ़ाव को बराबर करने की कोशिश करते रहे हैं। मंदी में वे ब्याज दरें घटाते हैं या ज़्यादा खर्च करते हैं, और तेज़ी में इसका उल्टा करते हैं। इन फ़ैसलों के पीछे के मॉडल पुराने आँकड़ों में दिखे पैटर्न पर टिके थे, जैसे कि बेरोज़गारी ज़्यादा होने पर महंगाई आम तौर पर कम रहती है, और परिवार अपनी आमदनी के हर अतिरिक्त डॉलर का एक तय हिस्सा खर्च करते हैं।
1970 के दशक के तेल संकटों के दौरान ये पैटर्न टूट गए। बेरोज़गारी बढ़ने के साथ-साथ महंगाई भी बढ़ी, और नीति ने ग़लत समय पर अर्थव्यवस्था को ज़रूरत से ज़्यादा बढ़ावा (stimulus) दिया। 1995 में यही पुरस्कार जीतने वाले रॉबर्ट ई. लुकास जूनियर (Robert E. Lucas, Jr.) ने तर्क दिया कि जैसे ही नीति इन पैटर्न का इस्तेमाल करने की कोशिश करेगी, वे बदल जाएँगे, क्योंकि नीति बदलने पर लोग अपना बर्ताव बदल लेते हैं। उन्होंने कहा कि मॉडल परिवारों और कारोबारों के फ़ैसलों से बनाए जाने चाहिए। ऐसे मॉडल बनाना कहने में आसान था, पर करने में कहीं ज़्यादा मुश्किल।
यह कैसे काम करता है
मान लीजिए ऊर्जा की कीमतें अचानक उछल जाती हैं। मॉडल में हॉल वाला हिस्सा परिवारों का वर्णन करता है। वे समय के साथ अपना खर्च एक जैसा बनाए रखने की कोशिश करते हैं, इसलिए वे सिर्फ़ इस महीने की तनख़्वाह के हिसाब से नहीं, आने वाले सालों में होने वाली कमाई की उम्मीद के हिसाब से खर्च करते हैं। ऊँची ब्याज दर बचत को ज़्यादा आकर्षक बनाती है, इसलिए वे आज कम खर्च करते हैं। कुछ परिवार उधार नहीं ले सकते या उनके पास कोई बचत नहीं होती, और वे बस जितना कमाते हैं, उतना खर्च कर देते हैं।
वुडफ़ोर्ड का मॉडल इसमें कारोबारों को जोड़ता है। कीमतें बदलने में खर्च आता है, इसलिए हर कारोबार उन्हें कभी-कभार ही नए सिरे से तय करता है, यानी कीमतें देर से बदलती हैं (sticky prices)। जब कोई कारोबार अपनी कीमत नए सिरे से तय करता है, तो वह आगे की सोचता है: अगर उसे लागत और प्रतिद्वंद्वियों की कीमतें बढ़ने की उम्मीद है, तो वह अभी ऊँची कीमत रखता है। इसलिए महंगाई उम्मीदों पर और उत्पादन अंतर (output gap) पर निर्भर करती है। अर्थव्यवस्था असल में जितना उत्पादन कर रही है और कीमतें आज़ादी से बदल पातीं तो जितना करती, उन दोनों के बीच का फ़र्क़ उत्पादन अंतर कहलाता है।
तीसरा नियम केंद्रीय बैंक का वर्णन करता है, जो पैसे की मात्रा को नियंत्रित करने के बजाय ब्याज दर तय करता है। ऊर्जा वाले उदाहरण में उत्पादन घटता है, लेकिन अर्थव्यवस्था जितना उत्पादन कर सकती है, वह और भी ज़्यादा घट जाता है, इसलिए जितनी आपूर्ति हो सकती है, उसके मुक़ाबले माँग ज़्यादा रहती है। तब मॉडल कहता है कि उत्पादन घटने के बावजूद केंद्रीय बैंक को ब्याज दरें बढ़ानी चाहिए। पुराने मॉडल उल्टी दिशा दिखाते थे, और इससे 1970 के दशक की नीतिगत ग़लतियों को समझने में मदद मिलती है। चूँकि परिवार और कंपनियाँ आगे की सोचते हैं, इसलिए केंद्रीय बैंक अपनी भविष्य की योजनाओं के बारे में जो कहता है, वह भी मायने रखता है, और यही वजह है कि साफ़ संवाद इस काम का हिस्सा बन गया।
नए टोल के बाद ट्रैफ़िक का अंदाज़ा
मान लीजिए कोई शहर एक व्यस्त पुल पर टोल लगाने की योजना बनाता है। एक योजनाकार बरसों के ट्रैफ़िक के आँकड़े देखता है और मान लेता है कि वे वैसे ही रहेंगे। दूसरा पूछता है कि गाड़ी चलाने वाले कहाँ जा रहे हैं, हर रास्ता उन्हें कितना महँगा पड़ता है और अगले महीने को लेकर उनकी क्या उम्मीदें हैं। जब ड्राइवर रास्ते बदलते हैं, तो पहला योजनाकार चूक जाता है, और कुछ लोग तो टोल शुरू होने से पहले, उसकी घोषणा वाले दिन ही रास्ता बदल लेते हैं। पुराने आर्थिक मॉडल ट्रैफ़िक के उन आँकड़ों जैसे थे। नए मॉडल परिवारों और कारोबारों के फ़ैसलों से शुरू होते हैं, जिनमें भविष्य को लेकर उनकी उम्मीदें भी शामिल हैं, इसलिए वे दिखा सकते हैं कि जब कोई केंद्रीय बैंक किसी बदलाव की घोषणा करता है, तो लोग कैसी प्रतिक्रिया देते हैं। इस तुलना की सीमाएँ हैं। असली ड्राइवरों की तरह असली परिवार भी सब के सब सोच-समझकर योजना बनाने वाले नहीं होते, और मिश्किन (Mishkin) के साथ हॉल के बाद के काम में पाया गया कि उनके आँकड़ों में लगभग पाँच में से एक परिवार जितना कमाता था, बस उतना खर्च कर देता था।
इसे पुरस्कार क्यों मिला1 min
- समिति कहती है कि उनके काम ने उन मॉडलों को एक स्थिर सैद्धांतिक आधार दिया, जिनका इस्तेमाल आज दुनिया भर के केंद्रीय बैंक और सरकारें करती हैं।
- हॉल के 1978 के शोधपत्र ने उम्मीदों से जुड़े एक सिद्धांत को सीधे परखने लायक बना दिया, जबकि उसे परखना नामुमकिन लगता था। समिति इसे एक यूरेका पल कहती है, जो उपभोग (consumption) पर आधुनिक शोध की बुनियाद बना।
- वुडफ़ोर्ड ने पूरा न्यू कीन्सियन मॉडल (New Keynesian model) बनाया, जिसके मूल में सिर्फ़ तीन समीकरण हैं। इसने मौद्रिक नीति के विश्लेषण का ध्यान मुद्रा आपूर्ति (money supply) से हटाकर ब्याज दर तय करने पर ला दिया, और आज ज़्यादातर केंद्रीय बैंक यही तरीक़ा अपनाते हैं।
- ये मॉडल आर्थिक फ़ैसलों को परिवारों के कल्याण से जोड़ते हैं, इसलिए इनसे सिर्फ़ अनुमान ही नहीं लगाया जाता, यह भी परखा जा सकता है कि कौन-सी नीति सबसे अच्छी है।
- केंद्रीय बैंक इनके बड़े राष्ट्रीय संस्करण बनाते हैं। स्वीडन का रिक्सबैंक (Riksbank) MAJA नाम का एक मॉडल इस्तेमाल करता है, जिसमें 29 तरह के झटके (shocks) शामिल हैं, और वित्त मंत्रालय टैक्स और सरकारी खर्च की नीति का अध्ययन करने के लिए ऐसे ही मॉडल इस्तेमाल करते हैं।
- समिति का तर्क है कि हाल के झटकों, जैसे महामारी और ताज़ा ऊर्जा संकटों, के बाद ऊँची महंगाई और धीमी वृद्धि के वैसे लंबे साल नहीं आए, जैसे 1970 के दशक के बाद दिखे थे। वह मानती है कि यह साबित करना मुश्किल है कि ऐसा बेहतर नीति की वजह से हुआ, लेकिन कहती है कि इस पर व्यापक सहमति है कि नीति ने बहुत अहम भूमिका निभाई।
आम ग़लतफ़हमियाँ2 min
खुद समझाइए3 min
10 सेकंड
दो अर्थशास्त्रियों ने वे मॉडल नए सिरे से बनाए, जिनसे केंद्रीय बैंक ब्याज दरें तय करते हैं, और उनकी शुरुआत इस बात से की कि परिवार और कारोबार भविष्य से क्या उम्मीद रखते हैं।
बच्चे को
कभी-कभी किसी देश का पैसों का सिस्टम बहुत गरम हो जाता है, यानी चीज़ों के दाम तेज़ी से बढ़ने लगते हैं, या बहुत ठंडा हो जाता है, यानी लोगों की नौकरियाँ जाने लगती हैं। दो वैज्ञानिकों ने यह अंदाज़ा लगाने के बेहतर तरीक़े खोजे कि परिवार और दुकानें कैसा बर्ताव करेंगी, ताकि ज़िम्मेदार लोग सही समय पर चीज़ों को ठंडा या गरम कर सकें।
30 सेकंड
1970 के दशक में अर्थव्यवस्था संभालने के लिए सरकारें जिन मॉडलों का इस्तेमाल करती थीं, वे काम करना बंद कर गए, और महंगाई और बेरोज़गारी एक साथ बढ़ीं। रॉबर्ट हॉल (Robert Hall) ने दिखाया कि लोग इस हिसाब से खर्च करते हैं कि उन्हें भविष्य में कितनी कमाई की उम्मीद है, और इसे परखने का एक चतुर तरीक़ा खोजा। माइकल वुडफ़ोर्ड (Michael Woodford) ने इस विचार को, देर से बदलने वाली कीमतों के साथ, पूरी अर्थव्यवस्था के एक सरल मॉडल में पिरोया। आज दुनिया भर के केंद्रीय बैंक इसके अलग-अलग संस्करणों से तय करते हैं कि ब्याज दरें कब बढ़ानी हैं और कब घटानी हैं।
2 मिनट
सरकारें और केंद्रीय बैंक अर्थव्यवस्था के उतार-चढ़ाव को कम करने की कोशिश करते हैं। जब मंदी आती है, तो वे ब्याज दरें घटाते हैं या ज़्यादा खर्च करते हैं, और जब अर्थव्यवस्था ज़रूरत से ज़्यादा गरम हो जाती है, तो इसका उल्टा करते हैं। दशकों तक इन फ़ैसलों के पीछे के मॉडल पुराने आँकड़ों के पैटर्न इस्तेमाल करते रहे, जैसे बेरोज़गारी ज़्यादा होने पर महंगाई का कम रहना। 1970 के दशक के तेल संकटों में ये पैटर्न टूट गए, और नीति ने हालात और बिगाड़ दिए। अर्थशास्त्रियों ने तर्क दिया कि मॉडल की शुरुआत परिवारों और कारोबारों के फ़ैसलों से होनी चाहिए। 1978 में रॉबर्ट हॉल (Robert Hall) ने इसका एक अहम हिस्सा दिया। अगर लोग भविष्य की उम्मीदों के हिसाब से खर्च करते हैं, तो उनका खर्च सिर्फ़ तब बदलता है जब कोई अनपेक्षित ख़बर आती है, इसलिए खर्च में होने वाले बदलावों का पहले से अनुमान लगाना नामुमकिन होना चाहिए। उन्होंने इसे परखा, और आँकड़े काफ़ी हद तक इससे मेल खाए। मिश्किन के साथ बाद के काम में पाया गया कि लगभग पाँच में से एक परिवार बस उतना खर्च करता है जितना कमाता है। माइकल वुडफ़ोर्ड (Michael Woodford) ने इसे ऐसे कारोबारों के साथ जोड़ा, जो अपनी कीमतें कभी-कभार ही बदलते हैं और बदलते समय आगे की सोचते हैं। नतीजा तीन समीकरणों वाला एक मॉडल था, जो परिवारों, कारोबारों और केंद्रीय बैंक के ब्याज दर वाले नियम का वर्णन करता है। यह दिखाता है कि अलग-अलग झटकों के लिए अलग-अलग जवाब चाहिए, और यह भी कि केंद्रीय बैंक अपनी भविष्य की योजनाओं के बारे में जो कहता है, उसका असर आज की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। 2008 के बाद जब ब्याज दरें शून्य पर पहुँच गईं, तो केंद्रीय बैंकों ने इसी विचार का इस्तेमाल किया, जिसे अग्रिम मार्गदर्शन (forward guidance) कहते हैं।
शब्द जो आप सुनेंगे2 min
- स्थिरीकरण नीति (Stabilisation policy)
- तेज़ी और मंदी को बराबर करने के लिए सरकारें और केंद्रीय बैंक ब्याज दरों, टैक्स और सरकारी खर्च के ज़रिए जो कदम उठाते हैं।
- सूक्ष्म आधार (Microfoundations)
- पूरी अर्थव्यवस्था का मॉडल, यानी समष्टि अर्थशास्त्र (मैक्रोइकॉनॉमिक्स) का मॉडल, अलग-अलग परिवारों और कारोबारों के फ़ैसलों से बनाना।
- स्टैगफ़्लेशन (Stagflation)
- एक ही समय में ऊँची महंगाई और ऊँची बेरोज़गारी, जैसा 1970 के दशक में हुआ।
- फ़िलिप्स वक्र (Phillips curve)
- महंगाई और बेरोज़गारी के बीच का संबंध। इसका पुराना रूप कहता था कि बेरोज़गारी ज़्यादा होने पर महंगाई कम रहती है।
- लुकास की आलोचना (Lucas critique)
- यह तर्क कि नीति बदलने पर पुराने आँकड़ों के पैटर्न बदल सकते हैं, क्योंकि लोग अपना बर्ताव बदल लेते हैं।
- रोज़ कमाने-खाने वाला परिवार (Hand-to-mouth household)
- ऐसा परिवार जो हर अवधि में जितना कमाता है, उतना खर्च कर देता है, अक्सर इसलिए कि वह उधार नहीं ले सकता या उसके पास बचत नहीं होती।
- देर से बदलने वाली कीमतें (Sticky prices)
- ऐसी कीमतें जिन्हें कारोबार कभी-कभार ही बदलते हैं, क्योंकि उन्हें बदलने में खर्च आता है।
- उत्पादन अंतर (Output gap)
- अर्थव्यवस्था जितना उत्पादन करती है और कीमतें आज़ादी से बदल पातीं तो जितना करती, उन दोनों के बीच का फ़र्क़।
- न्यू कीन्सियन मॉडल (New Keynesian model)
- अर्थव्यवस्था का एक मॉडल, जिसमें आगे की सोचने वाले परिवार और कंपनियाँ, देर से बदलने वाली कीमतें और ब्याज दर तय करने वाला केंद्रीय बैंक होते हैं।
- अग्रिम मार्गदर्शन (Forward guidance)
- केंद्रीय बैंक का लोगों को यह बताना कि वह भविष्य में ब्याज दरों के साथ क्या करने की योजना बना रहा है, ताकि आज के खर्च पर असर पड़े।
Sources, reader versions and the quiz are on the English page. It also covers the debate around this prize, with each view attributed to its source.